अर्थज्ञान

नोट को नोट ही रहने दो,नया नाम न दो…

नोटबंदी की सालगिरह हजारों लोगों को एक टीस देकर गुजर गयी, लेकिन न काला धन बाहर निकला,न नकली नोटों की बाढ़ रुकी। नोटों का रंग -रूप बदलने में जरूर भारतीय रिजर्व बैंक का करोड़ रूपए बर्बाद हो गये और नतीजा ठन-ठन गोपाल। अपनी ग़लती के लिए सरे आम फांसी की सजा मुकर्रर करने वाले लोग आज भी बेगुनाह बने हुए हैं,अब एटीएम से न दो हजार का नोट निकल रहे हैं और न दूसरे नोट। जनता ले-देकर पांच सौ के नोट के ऊपर निर्भर है। एटीएम के रीसेट किए गए खाने खाली पड़े हुए हैं। हमारे देश में न एक पैसे का सिक्का है और न एक रुपया का नोट। याद कीजिए आपने पिछली बार दो हजार रुपये का नोट कब देखा था? नोट हों तो दिखें!

दरअसल पिछले तीन साल से 2 हजार रुपये का एक भी नोट छापा ही नहीं गया है. ऐसे में यह नोट सर्कुलेशन में नहीं के बराबर है. सरकार द्वारा 8 नवंबर, 2016 को 500 और 1,000 रुपये के पुराने नोटों पर प्रतिबंध लगाकर नोटबंदी की घोषणा की गई थी और फिर नए नोट आए थे जिसमें 2000 रुपये का नोट भी शामिल था. आधिकारिक मुताबिक, साल 2019-20, 2020-21 और 2021-22 के दौरान दो हजार रुपये का कोई नया नोट छापा ही नहीं गया. आरबीआई नोट मुद्रण (पी) लिमिटेड ने वित्त वर्ष 2016-17 में 2,000 रुपये के 3,5429.91 करोड़ नोट छापे थे. इसके बाद 2017-18 में काफी कम 1115.07 करोड़ नोट छापे गए और 2018-19 में इसे और कम कर मात्र 466.90 करोड़ नोट छापे गए. दुनिया के तमाम देश हैं जहां छोटे से छोटा सिक्का और बड़े से बड़ा नोट उपलब्ध है किन्तु भारत में नहीं। भारत की मौजूदा पीढ़ी इतनी बदनसीब है कि उसने अपनी देश की सबसे छोटी मुद्रा देखी ही नहीं। एक,दो, तीन,पांच,दस, पच्चीस,पचास के सिक्के और नोट अब संग्रहालय की वस्तु हैं। न जाने कब से भारत में छोटे सिक्के और नोट छपे ही नहीं हैं।25और 50 के सिक्के तो हाल के वर्षो में ही बंद किए गए, जो बचे हैं उनकी कीमत चाकलेट के बराबर भी नहीं रही। मुझे आशंका है कि भविष्य में यही फजीहत कहीं प्रचलित नोटों की भी न हो जाए।

देश की अर्थव्यवस्था, राजनीति, विदेश नीति पर सवाल करना अब फिजूल है। आप सवाल करते ही देशद्रोही करार दे दिए जाते हैं, बावजूद इसके हमारे जैसे हजारों लोग आज भी सवाल करने से पीछे नहीं रहते। ये सवाल इसलिए भी जरूरी हैं क्योंकि हमारी मौद्रिक प्रणाली की दशा बेहद खराब है। मै इन दिनों अमेरिका में हूं। यहां की मौद्रिक प्रणाली में प्रचलित एक पैसे से लेकर सबसे बड़ा नोट आसानी से न केवल उपलब्ध है बल्कि सहज स्वीकार्य भी हैं। नोटबंदी को लेकर विद्वानों के मन में जो आशंकाएं थीं,वे एक,एककर सामने आ रही हैं। लेकिन कोई भी जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं है। वैसे जिम्मेदारी सामूहिक है लेकिन दम अकेले पंत प्रधान‌ ने भरा था, इसलिए किसी और की गर्दन कैसे पकड़ी जा सकती है।आज वक्त आ चुका है जब लोगों के सामने सच आए।ये वक्त है जब हम अपनी गलतियों पर पर्दाा डालने की कोशिश से बचें।ये कैसे होगा, ये हम नहीं विशेषज्ञ बता सकते हैं। सरकार को मान लेना चाहिए कि नोटबंदी नाकाम रही। सरकार को मान लेना चाहिए कि नोटबंदी के बाद भी नकली नोटों की संख्या में तेज इजाफा हुआ है। आंकड़ों के मुताबिक, देश में जब्त किए गए 2,000 रुपये के नकली नोटों की संख्या 2016 और 2020 के बीच 2,272 से बढ़कर 2,44,834 हो गई है. आंकड़ों के मुताबिक, साल 2016 में देश में पकड़े गए नकली 2,000 रुपये के नोटों की कुल संख्या 2,272 थी. यह साल 2017 में बढ़कर 74,898 हो गई. इसके बाद उन्होंने साल 2018 में यह घटकर 54,776 रह गई. साल 2019 में यह आंकड़ा 90,566 और साल 2020 में 2,44,834 नोट रहा. सरकार तो सरकार विपक्ष भी नोटबंदी के मुद्दे को भूल गया है। किसी भी चुनाव में अब नोटबंदी का जिक्र ही नहीं होता। जिक्र होता तो ये मुद्दा यूं ही समाप्त नहीं हो सकता। नागरिक मोर्चे पर भी ये मुद्दा पुनर्जीवित होना चाहिए। क्योंकि ये मामला अब देश की मान प्रतिष्ठा से जुड़ा है। आइए देश के रूपए को रुसवा होने से बचाइए।

 

व्यक्तिगत विचार-आलेख-

श्री राकेश अचल जी ,वरिष्ठ पत्रकार , मध्यप्रदेश  । 

 

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