राजनीतिनामा

मुगल गार्डन से अमृत उद्यान तक दिल्ली

मै अपनी सरकार की मितव्ययिता और दूरदृष्टि का कायल हूं। हमारी सरकार एक पाई खर्च किए बिना पुराने को नया करने का हुनर सीख गई है।ऐसा करने से मुगलसराय पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर हो जाता है और इलाहाबाद प्रयाग। काशी भी आने वाले दिनों में क्वेटो हो जाए तो किसी को हैरान नहीं होना चाहिए। भारत में अंग्रेजों से पहले दिल्ली,आगरा, औरंगाबाद, हैदराबाद और अन्य कयी शहरों में मुगल बगीचे बना चुके थे। बाबर, से लेकर शाहजहां तक बागीचा प्रेमी सुल्तान थे। दिल्ली का मुगल गार्डन भी सरकार की आंखों की किरकिरी था सरकार ने सैकड़ों साल पुराने मुगल गार्डन को चुटकी बजाकर ‘अमृत उद्यान ‘में बदल दिया। सरकार नया अमृत उद्यान बनाती तो कहां से बाबर के वंशजों और बाद में लुटियन जैसा वास्तुकार खोजती और कहां से मुगल गार्डन का नवीनीकरण कराने वाली लेडी हार्डिंग जैसी इच्छा शक्ति लाती।। नये बगीचे के लिए बजट का इंतजाम करना पड़ता सो अलग। इन तमाम झंझटों से बचने के लिए मुगल गार्डन की तख्ती हटाकर वहां अमृत उद्यान की तख्ती लगाना ज़्यादा आसान था,सो सरकार ने किया। इस तरह मुगलिया सांप भी मर गया और सनातनी लाठी भी नहीं टूटी। इतिहास बदलने के लिए नाम बदलने से आसान काम कुछ नहीं है। इसमें न हल्दी लगती है और न फिटकरी और रंग चोखा आ ही जाता है। सर एडवर्ड लुटियंस ने मुगल गार्डन बनाते समय सोचा भी न होगा कि राष्ट्रभक्त भारतीय उनके काम को सौ साल में ही अपने नाम कर लेंगे। मुगलों को तो इसकी कल्पना तक नहीं होगी। सरकार जिस मुस्तैदी से शहरों और बागीचों के नाम बदल रही हैं उसे देखकर मुझे लगता है कि केंद्र में एक नाम परिवर्तन मंत्रालय की स्थापना भी की जाए। भारत के एक दर्जन से अधिक राष्ट्रपति इस मुगल गार्डन के संरक्षक बने रहे लेकिन मौजूदा राष्ट्रपति श्रीमती मुर्मू मुगल गार्डन को नहीं बचा पाई, जैसे कांग्रेस सरकार अयोध्या की बाबरी मस्जिद को नहीं बचा पायी थी। फर्क सिर्फ इतना है कि मस्जिद ढहा दी गई थी और मुगल गार्डन की सिर्फ नाम पट्टिका बदली गई है।

हमारे पुरखे बताते हैं कि 1911 में जब अंग्रेजों ने तय किया कि राजधानी कलकत्ता से दिल्ली ले आएं तो उन्होंने दिल्ली डिजाइन करने के लिए प्रसिध्द अंग्रेज वास्तुकार एडवर्ड लुटियन्स को इंग्लैंड से भारत बुलाया। उन्होंने दिल्ली आकार वायसराय हाउस के लिए रायसीना की पहाड़ी का चयन किया। उसे काटकर वायसराय हाउस (जिसे अब राष्ट्रपति भवन कहते हैं), का जो नक्शा तैयार किया उसमें भवन के साथ-साथ बाग-बगीचा तो था, लेकिन वह ब्रिटिश शैली के थे। तत्कालीन वाइररॉय लॉर्ड हार्डिंग की पत्नी लेडी हार्डिंग ने तब यहां भारतीय शैली के बगीचे बनाने का सुझाव दिया । लेडी हार्डिंग ने श्रीनगर में निशात बाग और शालीमार बाग देखे थे, जो उन्हें बहुत भाये। बस तभी से मुगल उद्यान शैली उनके मन में बैठ गयी थी। वह इन बागों से इस तरह रोमांचित हो उठी थीं कि वायसराय हाउस में मुगल गार्डन को साकार होते देखना चाहती थीं। उन्होंने लुटियन्स के सामने अपनी बात रखी। वास्तुकार लुटियन्स लेडी हार्डिंग का बह्तु सम्मान करते थे। इसलिए वायसराय हाउस में मुगल उद्यान की उनकी परिकल्पना को साकार रूप देने को मना नहीं कर सके। उन्होंने जम्मू-कश्मीर के खूबसूरत उद्यानों, ताजमहल के उद्यान तथा पारसी और भारतीय चित्रकारियों से प्रेरित होकर इन उद्यानों का खाका तैयार किया। सन १९२८ में लॉर्ड इर्विन ने इस वायसराय हाउस में शानोशौकत के साथ कदम रखा। उन्हें लुटियन्स द्वारा डिजाइन किया गया भवन और परिकल्पित मुगल उद्यान बहुत भाया। तभी से इस उद्यान को मुगल उद्यान नाम मिला। परिवर्तन की इस बयार में क्या -क्या और बदला जाएगा , कोई नहीं जानता। लेकिन मुमकिन है कि अगली बारी कुतुब मीनार या लाल किले की हो ! अगर अगले आम चुनाव में भाजपा को जनता का आशीर्वाद मिला तो मुमकिन है कि लाल किला केसर दुर्ग और क़ुतुब मीनार विष्णु स्तंभ हो जाए। हमारी सरकार नया तो कुछ बनाने से रही। हमारे मप्र में भी डबल इंजन की सरकार हबीबगंज रेलवे स्टेशन को रानी कमलापत स्टेशन कर दिया है। नाम बदलना सबसे आसान तरीका है इतिहास से छेड़छाड़ करने का। इसमें रक्तपात और तोड़फोड़ की जरूरत नहीं होती। ये इतिहास परिवर्तन का अहिंसक तरीका है। नाम बदलने के लिए न संसद से पूछना पड़ता है और न सुप्रीम कोर्ट से। जनता से तो पूछने का सवाल ही पैदा नहीं होता। सवालों से वैसे भी हमारी सरकार और आदरणीय पंत प्रधान को सख्त चिढ़ है। दुनिया में पिछले आठ साल में कहीं भी इतने नाम नहीं बदले गये जितने कि हिंदुस्तान में बदले गए। हालांकि इन आठ साल में दुनिया के तमाम देशों में सरकारें बदली हैं। चीन, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान हमारे निकटस्थ पड़ौसी हैं किन्तु यहां नाम बदलने की कोई मुहिम नहीं चलाई गई। नाम इन देशों की समस्या नहीं है। ये देश जिन समस्याओं से जूझ रहे हैं वैसी ही समस्याएं हमारी भी है। लेकिन हम इनसे नहीं, नामों से जूझ रहे हैं। मुगलिया सल्तनत के समय रखें नाम हमारी आंखों में कांटे की तरह चुभते हैं।

व्यक्तिगत विचार-आलेख-

श्री राकेश अचल जी  जी ,वरिष्ठ पत्रकार  एवं राजनैतिक विश्लेषक मध्यप्रदेश  । 

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