हमारा इतिहास

हमारा इतिहास : मुख्यमंत्री काटजू का भोपाल में कोई परिचित न था

हमेशा विवादों में रहने वाले विख्यात विख्यात न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू कैलाश नाथ काटजू के प्रपौत्र है उस जमाने में जब कारों की कीमत मात्र दो-तीन हजार होती थी तब काटजू की आमदनी ₹25000 महीने आंकी जाती थी देश के पहले मंत्रिमंडल में जो कांग्रेश के नेतृत्व में सन 1937 में गठित हुआ उस समय जब काटजू को उसमें शामिल होने के लिए कहा गया तो वह अपनी प्रैक्टिस छोड़ने को तैयार नहीं थे तत्कालीन कांग्रेसीअध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद की काफी समझाइस के बाद वे सहमत हुए तो उन्होंने अपनी बैंक पासबुक सामने रख दी जिसमें कहा जाता है कि उस समय 1300000 रुपए थे।  ऐसा करते हुए उन्होंने कहा कि मैं नहीं चाहता कि जब मैं मंत्री पद से हटा तो कोई मुझ पर लांछन लगाए कि मैंने गलत तरीकों से यह संपत्ति अर्जित की है।

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कालांतर में स्वतंत्रता पूर्व एवं बाद में गृह रक्षा और विधि विभाग के मंत्री रहे 21 जनवरी 1957 को जब काटजू भोपाल के बैरागढ़ हवाई अड्डे पर उतरे तो उन्हें भोपाल में जानने वाला कोई नहीं था उसी  दिन राजू ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली क्योंकि नेहरू और कांग्रेसी कमान का आदेश था इसलिए ऊपरी तौर पर मध्य प्रदेश के सभी नेताओं ने काटजू को मुख्यमंत्री तो स्वीकार कर लिया और मन से वे उन्हें कभी नहीं स्वीकार कर सके .सन 1957 के आम चुनाव में कांग्रेस का नेतृत्व उन्होंने किया काग्रेस को बहुमत मिला । काटजू मंत्रिमंडल में भगवंतराव मंडलोई, मिश्रीलाल गंगवाल ,शंकर दयाल शर्मा, वेंकटेश नरेश चंद्र, गणेश रामानंद, रानी पद्मावती देवी और अब्दुल कादिर सिद्दीकी ( सभी केबिनेट मंत्री ) नरसिंह राव दीक्षित, केशवलाल गुमास्ता, जगमोहनदास, मथुरा प्रसाद दुबे, शिवभानु सिंह सोलंकी , सज्जन सिंह , दशरथ जैन , श्याम सुंदर नारायण मुशरान, सीताराम जाजू, गोविंद नारायण सिंह ,  और वसंतराव उइके  उप मंत्री बने । दूसरी विधानसभा में फिर अध्यक्ष कुंजीलाल दुबे और उपाध्यक्ष अनंत सदाशिव  पटवर्धन चुने गए , प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के विधायक चन्द्रप्रताप तिवारी सबसे बड़े विरोधी दल के नेता थे विधानसभा में कुल 15 महिलाएं चुनकर आईं ।

वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनैतिक विश्लेषक
श्री दीपक तिवारी कि किताब “राजनीतिनामा मध्यप्रदेश” से साभार ।

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