नई दिल्ली। भारतभवः
चुनावी राजनीति में विचारधारा, संगठन और जनसमर्थन के साथ अब आर्थिक ताकत भी बेहद महत्वपूर्ण हो गई है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों को मिले चंदे के आंकड़े इसी तस्वीर का एक बड़ा पहलू सामने रखते हैं। चुनाव आयोग की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक, इस चुनावी दौर में भाजपा को ₹1,472.8 करोड़ का चंदा मिला, जबकि कांग्रेस को ₹207.17 करोड़ प्राप्त हुए। यानी भाजपा को कांग्रेस की तुलना में करीब सात गुना अधिक चंदा मिला।चुनावी अवधि के दौरान भाजपा के खाते में जमा राशि में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज हुई। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 15 मार्च को भाजपा के खाते में ₹6,722.6 करोड़ थे, जो 6 मई तक बढ़कर ₹7,627.2 करोड़ हो गए। यानी इस अवधि में पार्टी के फंड में करीब ₹904.6 करोड़ की वृद्धि हुई।यह आंकड़ा बताता है कि चुनावी राजनीति में भाजपा की वित्तीय क्षमता लगातार मजबूत बनी हुई है। बड़ी आर्थिक क्षमता का सीधा असर चुनाव प्रचार, संगठनात्मक गतिविधियों और व्यापक स्तर पर चुनावी अभियान चलाने की क्षमता पर पड़ सकता है।
दूसरी ओर कांग्रेस के सामने तस्वीर अलग दिखाई देती है। चुनावी अवधि की शुरुआत में कांग्रेस के केंद्रीय मुख्यालय और पांच राज्य इकाइयों के पास लगभग ₹169.06 करोड़ थे। इनमें करीब ₹22.9 करोड़ नकद और ₹146.1 करोड़ बैंक खातों में बताए गए। 6 मई तक कांग्रेस के पास लगभग ₹103.2 करोड़ शेष रह गए। यानी चुनावी अवधि के दौरान उसके उपलब्ध फंड में करीब ₹65.86 करोड़ की कमी दर्ज हुई। इन चुनावों में भाजपा ने पश्चिम बंगाल और असम में जीत हासिल की, जबकि पुडुचेरी में उसके गठबंधन को सफलता मिली। तमिलनाडु में टीवीके और केरल में कांग्रेस की जीत हुई। भाजपा ने अभी तक तीन राज्यों में अपने चुनावी खर्च का विवरण सार्वजनिक किया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इन तीन राज्यों में सबसे अधिक ₹97 करोड़ असम में खर्च किए गए। पश्चिम बंगाल और केरल में पार्टी ने कितना खर्च किया, उसका विवरण अभी उपलब्ध नहीं कराया गया है। यही वजह है कि केवल चंदे की राशि देखकर किसी पार्टी की वास्तविक चुनावी आर्थिक स्थिति का पूरा आकलन करना आसान नहीं है। इसके लिए कुल प्राप्त चंदा, वास्तविक चुनावी खर्च और उपलब्ध शेष राशि—तीनों को एक साथ देखना होगा।
इन आंकड़ों से भारतीय राजनीति के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है—क्या चुनाव लड़ने की क्षमता लगातार आर्थिक संसाधनों से जुड़ती जा रही है? एक तरफ भाजपा के पास हजारों करोड़ रुपये का बड़ा वित्तीय आधार दिखाई देता है, वहीं कांग्रेस जैसे विपक्षी दल सीमित संसाधनों के साथ चुनावी मुकाबले में बने रहने की कोशिश कर रहे हैं। लोकतंत्र में चुनाव जनता के वोट से जीते जाते हैं, लेकिन आज के दौर में चुनावी प्रचार, डिजिटल अभियान, संगठन का विस्तार और मतदाताओं तक पहुंच बनाने के लिए बड़े आर्थिक संसाधनों की जरूरत पड़ती है। ऐसे में राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे की पारदर्शिता और उसके स्रोतों पर बहस स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है।
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