राजनीतिनामा

विधानसभा चुनाव 2023 : अनुभववियों का भविष्य…

भोपालI प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायती राज और नगरीय निकाय के चुनाव से राजनीतिक दलों में अनुभव कर लिया है कि 2023 के विधानसभा के आम चुनाव में अनुभवी नेतृत्व ही पार्टी की नैया पार लगाएगा अन्यथा जरा सी विपरीत परिस्थिति होने पर नया नेतृत्व लड़खड़ा जाता है।

दरअसल, अनुभव का महत्त्व परिवार व्यापार शासन – प्रशासन में तो पहले से ही माना जाता है। अब राजनीतिक क्षेत्र में भी अनुभव की आवश्यकता महसूस की जा रही है। खासकर प्रदेश की राजनीति में हाल ही में संपन्न हुए पंचायती राज और नगरीय निकाय के चुनाव के दौरान यह बात कई जगह प्रमाणित हुई है। प्रदेश में सत्तारूढ़ दल भाजपा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को अनुभव के आधार पर चौथी बार मुख्यमंत्री बनाए हुए हैं, तो विपक्षी दल कांग्रेस भी अपने सबसे अनुभवी नेता कमलनाथ के भरोसे सरकार बनाने का सपना संजोए हुए है। प्रदेश स्तर पर अनुभवी नेताओं की मौजूदगी कई बार उन जिलों में भी काम आई जहां कमान नए नेतृत्व के हाथों में थी। कहीं-कहीं जोश और होश का समन्वय भी देखने को मिला।

बहरहाल, प्रदेश में मिशन 2023 की तैयारियां तेजी से शुरू हो गई हैं। भाजपा और कांग्रेस में जमावट स्थानीय निकाय के चुनाव में भी 2023 को दृष्टिगत रखते हुए बनाई गई है। जनपद अध्यक्ष नगर पालिका अध्यक्ष जिला पंचायत अध्यक्ष महापौर और नगर निगम के अध्यक्ष में से भी कुछ को 2023 का चुनाव लड़ाया जाएगा जब तक इनमें राजनीतिक अनुभव भी आ जायेगा इनकी पहचान अभी क्षेत्र में नेता की बन जाएगी। इन्हीं में से कुछ 2024 में लोकसभा का चुनाव भी लड़ सकते हैं। जिस तरह की परिस्थितियां पंचायती राज और नगरीय निकाय के चुनाव के दौरान बनी है यदि ऐसी ही परिस्थिति रही तो बेहतर प्रत्याशी चयन ही जीत का मुख्य आधार रहेगा क्योंकि किसी भी दल की लहर इन चुनावों में देखने को नहीं मिली। इन चुनाव में यदि राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो केवल महापौर के चुनाव ऐसे बड़े चुनाव थेे जो विधानसभा लोकसभा की तर्ज पर पार्टी के टिकट पर पार्टी चुनाव चिन्ह लड़े गये और इनके परिणाम दोनों ही दलों की स्थिति तो बता ही गए कि जहां-जहां बेहतर प्रत्याशी थे वहां की बजाए उन क्षेत्रों में दलों को भारी दिक्कत हुई जहां उनके प्रत्याशी कमजोर पड़ रहे थे।

इसका सीधा अर्थ था कि प्रदेश में किसी भी दल की लहर नहीं थी। पिछले चुनाव जैसी ना भाजपा सभी 16 सीटें जीतने में सफल हुई और ना ही लोकसभा चुनाव जैसी पार्टी की लहर थी कि किसी को भी टिकट दे दिया और वह आसानी से जीत गया। पार्टी ने जो भी सीटें जीती हैं वे प्रबंधन की दम पर जीती है। इसके लिए सत्ता और संगठन ने पूरी ताकत झोंकी और अनुभवी नेताओं को चुनाव की कमान सौंपी। वहीं दूसरी ओर विपक्षी दल कांग्रेस ने तीन सर्वे रिपोर्टों  के आधार पर पार्टी के अंदर अधिकतम बेहतर प्रत्याशी तो दे दिए लेकिन प्रबंधन पार्टी की तरफ से कहीं पर दिखाई नहीं दिया। प्रत्याशियों को अपने दम पर चुनाव लड़ना पड़ा और आिखरी समय कुछ क्षेत्रों में प्रत्याशियों का दम फूलने लगा क्योंकि भाजपा प्रत्याशियों की बजाय कांग्रेस ने लगभग 10 दिन पहले अपने प्रत्याशी घोषित कर दिये थे। कांग्रेस केवल उन क्षेत्रों में जीत दर्ज कर पाई जहां पर प्रत्याशियों की छवि में ज्यादा अंतर था और भाजपा का स्थानीय नेतृत्व प्रबंधन नहीं कर पाया।

कुल मिलाकर जिस तरह से अब चुनाव उतार-चढ़ाव वाले और अंतिम समय में पासा पलटने वाले हो गए हैं उस दृष्टि से राजनीतिक दलों को अब अनुभवी नेतृत्व की जरूरत महसूस होने लगी है जो समय काल परिस्थिति के हिसाब से निर्णय ले सके। जैसा कि पंचायती राज और नगरी निकाय चुनाव के दौरान देखने सुनने को मिला।

 

देवदत्त दुबे -भोपाल- मध्यप्रदेश 

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