अमित मालवीय के नेतृत्व में बीजेपी का आईटी सेल देश की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक डिजिटल मशीनरियों में गिना जाने लगा। सोशल मीडिया पर पार्टी के संदेश को तेजी से फैलाना, विपक्ष के आरोपों का जवाब देना, ट्रेंड तैयार करना और डिजिटल नैरेटिव को राजनीतिक बहस का हिस्सा बनाना—इन सभी मोर्चों पर आईटी सेल की भूमिका लगातार बढ़ी।लेकिन इसी दौर में बीजेपी के आईटी सेल को लेकर विवाद भी कम नहीं रहे। विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा कि सोशल मीडिया पर राजनीतिक बहस को आक्रामक बनाने, विरोधियों के खिलाफ अभियान चलाने और कभी-कभी विवादित सामग्री को बढ़ावा देने में बीजेपी की डिजिटल टीम की भूमिका रही।हालांकि, इन आरोपों को पार्टी की ओर से हमेशा राजनीतिक विरोधियों का आरोप बताया जाता रहा है। इसलिए केवल विवादों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि मालवीय को इसी वजह से हटाया गया।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बदलाव केवल व्यक्ति का नहीं है। ‘आईटी सेल’ की जगह ‘सोशल मीडिया टीम’ नाम का इस्तेमाल भी अपने आप में एक राजनीतिक संदेश माना जा सकता है।एक संभावना यह है कि पार्टी डिजिटल राजनीति को अब केवल ‘आईटी सेल’ की छवि तक सीमित नहीं रखना चाहती। सोशल मीडिया आज केवल तकनीकी प्रचार का माध्यम नहीं है, बल्कि जनसंपर्क, संवाद, वीडियो कंटेंट, डिजिटल अभियान और राजनीतिक नैरेटिव का बड़ा मंच बन चुका है। दूसरी ओर, पार्टी के आलोचकों का तर्क है कि ‘आईटी सेल’ शब्द पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक विवादों से इतना जुड़ गया कि बीजेपी अब अपनी डिजिटल पहचान को नए सिरे से पेश करना चाहती है। हालांकि, यह कहना जल्दबाजी होगी कि नाम बदलने का सीधा संबंध अमित मालवीय से है। इसके पीछे पार्टी की व्यापक डिजिटल रणनीति भी हो सकती है।
यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अमित मालवीय को केवल सोशल मीडिया की जिम्मेदारी से हटाया गया है, इसका अर्थ यह नहीं है कि उनका राजनीतिक प्रभाव समाप्त हो गया।मालवीय को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई थी और वे वहां पार्टी के सह-प्रभारी की भूमिका में रहे। ऐसे में पार्टी के लिए उनके संगठनात्मक अनुभव और चुनावी रणनीति को पूरी तरह नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।राजनीतिक जानकारों के बीच एक राय यह भी है कि यह बदलाव किसी नाराजगी का परिणाम न होकर ‘रोल रीडिजाइन’ यानी भूमिका में बदलाव हो सकता है। यदि ऐसा है तो आने वाले समय में मालवीय को किसी अन्य महत्वपूर्ण जिम्मेदारी में देखा जा सकता है।
बीजेपी ने छत्तीसगढ़ में नितिन नबीन के साथ काम कर चुके दीपक म्हस्के को सोशल मीडिया प्रमुख की जिम्मेदारी दी है। उनके साथ प्रीति गांधी, शिवानंद द्विवेदी, आलोक भट्ट और अरुण यादव को सह-प्रभारी बनाया गया है।नई टीम के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल सोशल मीडिया पर बीजेपी की मौजूदगी बनाए रखना नहीं होगी। असली चुनौती होगी—डिजिटल राजनीति को आक्रामक प्रचार से आगे ले जाकर प्रभावी संवाद में बदलना।आज सोशल मीडिया पर केवल पार्टी समर्थकों तक संदेश पहुंचाना पर्याप्त नहीं है। युवा मतदाता, पहली बार वोट देने वाले लोग, मध्यम वर्ग, ग्रामीण क्षेत्र के इंटरनेट यूजर्स और लगातार बदलते डिजिटल प्लेटफॉर्म—इन सभी तक अलग-अलग भाषा और शैली में पहुंच बनानी होगी।
आने वाले चुनावों में सोशल मीडिया की भूमिका और बढ़ने वाली है। राजनीतिक दलों के लिए फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स, यूट्यूब और शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म केवल प्रचार के साधन नहीं रह गए हैं। ये मतदाता की धारणा बनाने और राजनीतिक बहस की दिशा तय करने के प्रमुख माध्यम बन चुके हैं।
बीजेपी जैसी कैडर आधारित पार्टी के लिए यह बदलाव और भी महत्वपूर्ण है। संगठन की जमीन पर मौजूद ताकत को डिजिटल नेटवर्क से जोड़ना नई टीम की प्राथमिकता हो सकती है।यही वजह है कि सोशल मीडिया टीम में यह बदलाव केवल चेहरों की अदला-बदली मानना शायद अधूरा विश्लेषण होगा।आखिरकार राजनीति में संगठन बदलते हैं, चेहरे बदलते हैं और रणनीतियां भी बदलती हैं। लेकिन असली परीक्षा चुनाव के मैदान में होती है। बीजेपी की नई सोशल मीडिया टीम की असली सफलता इस बात से तय होगी कि वह डिजिटल शोर को कितने प्रभावी राजनीतिक संवाद में बदल पाती है।
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