नई दिल्ली। लोकतंत्र में विरोध और प्रदर्शन की आजादी बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन क्या इस अधिकार के नाम पर किसी सार्वजनिक स्थान पर अनिश्चितकाल तक कब्जा किया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने इस सवाल पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए साफ कर दिया है कि सार्वजनिक स्थान किसी एक संगठन या आंदोलन की स्थायी संपत्ति नहीं हो सकते। प्रदर्शन का अधिकार सभी को है और किसी एक समूह को इसके नाम पर दूसरों के अधिकारों की अनदेखी करने की छूट नहीं दी जा सकती।मंगलवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई भी संगठन किसी सार्वजनिक स्थान पर अनिश्चितकाल तक कब्जा नहीं कर सकता। यहां तक कि प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थानों पर भी समय सीमा तय होनी चाहिए, ताकि दूसरे संगठनों और समूहों को भी अपनी आवाज उठाने का अवसर मिल सके।मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान सवाल उठाया कि यदि कोई संगठन हमेशा के लिए किसी जगह पर कब्जा कर लेगा तो किसान, पत्रकार, मजदूर और दूसरे प्रदर्शनकारी अपनी बात कहने कहां जाएंगे? अदालत ने स्पष्ट किया कि विरोध प्रदर्शन का अधिकार किसी एक संगठन का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि लोकतंत्र में सभी नागरिकों का अधिकार है।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली में अक्टूबर में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हुए प्रदर्शनों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई चल रही थी। जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने इस दौरान पुलिस कार्रवाई, प्रदर्शनकारियों की हिरासत, निगरानी, प्रदर्शन स्थलों और कारोबारियों को हुए नुकसान जैसे मुद्दों पर भी सुनवाई की। दालत की टिप्पणी ने एक बार फिर लोकतंत्र में अधिकारों और जिम्मेदारियों के बीच संतुलन की जरूरत को सामने ला दिया है।लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि यहां सरकार की नीतियों से असहमति जताने, सवाल पूछने और सड़कों पर उतरकर विरोध करने की आजादी है। लेकिन इस आजादी का इस्तेमाल करते समय यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि सार्वजनिक स्थानों पर दूसरे नागरिकों का भी उतना ही अधिकार है।
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