कलमदार

हार बांटते चलो ! बस हार बांटते चलो!!

मुद्दा स्थानीय निकाय के चुनाव नहीं बल्कि चुनाव में हुई हार और जीत का है. अनेक छोटे राज्यों के विधानसभा चुनाव जैसे मुंबई महापालिका चुनाव में भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को मिली जीत और शेष विपक्ष को मिली हार से एक बार फिर साबित हो गया है कि अब देश में चुनाव जीतने का कौशल सिर्फ भाजपा के पास है.किसी और की बात मैं नहीं करता किंतु मुझे लगने लगा है कि देश में अब भाजपा से जीतना विपक्ष के लिए आसान नहीं है. भाजपा जिस ठंग से चुनाव लड रही है उसमें साम, दाम, दंड और भेद सब शामिल हैं. ऐसे में भाजपा बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम, पाडिचेरी विधानसभा चुनाव भी जीत ले तो हैरान होने की जरूरत नही है.
                     महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनाव और बीएमसी (बृहन्मुंबई महानगरपालिका) में मिली करारी हार के बाद शिवसेना (उद्धव गुट) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने बीजेपी और शिवसेना (शिंदे गुट) पर तीखा हमला बोला है.कांग्रेस और एनसीपी की तो बोलती बंद है. पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और मनसे के राज ठाकरे की युति भी भाजपा गठबंधन को आगे बढने से नहीं रोक सकी.उद्धव ठाकरे ने माना है कि यह चुनाव बेहद कठिन परिस्थितियों में लड़ा गया, जब सत्ता, संसाधन और संस्थागत ताकत उनके पक्ष में नहीं थी. उन्होंने बीजेपी पर सीधा आरोप लगाते हुए कहा कि उनके विरोधी यह सोचते हैं कि कागज और चुनाव चिन्ह छीनकर शिवसेना को खत्म किया जा सकता है, लेकिन “माटी से जुड़ी शिवसेना” को कोई समाप्त नहीं कर सकता. ठाकरे ने कहा कि सत्ता पक्ष ने ‘शक्ति, पैसा और धमकी’ के जरिए लोगों को तोड़ने की कोशिश की और दलबदल को बढ़ावा दिया. उनके मुताबिक, जो लोग पार्टी छोड़कर गए, वे भले ही सत्ता के साथ हों, लेकिन असली शिवसैनिकों की निष्ठा आज भी अडिग है और इसे खरीदा नहीं जा सकता.
                  महापालिका के चुनाव परिणाम बताते हैं कि अब मराठी अस्मिता का नारा और ठसक दोनों बीते दिनों की बात हो गई है. भाजपा ने पहले शिव सेना और ऐनसीपी को तोडा और अब उन गुटों को भी निगलने की तैयारी में हैं जो भाजपा के साथ हैं. मुमकिन है कि भाजपा एकनाथ की शिवसेना और अजित पवार की एनसीपी को भी एक बार और तोड दे ताकि इन गुटों के नेताओं की ताकत इतनी कम हो जाए कि वे भाजपा से सौऔदेबाजी की स्थिति में ही न रहें.
                 देश में चुनाव अब मजाक बन चुके हैं. आप कोई भी वैट, किसी भी कीमत पर खरीद सकते हैं. मुंबई में भाजपा ने तो दो हजार रुपये में खुले आम वैट खरीदे किंतु कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलैं ने भाजपा को बेनकब करने के बजाय खुद भी वोट खरीदने की चेष्टा की और यहीं सब मात खा गये. विपक्ष के रुपये भी बर्बाद हुए और भाजपा का विजय रथ भी नहीं रुका. ये रुकेगा भी नहीं.मुझे आशंका है कि महार में वोट खरीदने क मुहिम कामयाब होने के बाद भाजपा इस साल होने वाले विधानसभा के हर चुनाव में वोट खरीदने में संकोच नहीं करेंगी. भाजपा कदाचरण के संकोच से उबल चुकी है. असम में भाजपा की सरकार है, वहाँ महिला मतदाओं को एक योजना के तहत नगद रकम बांटी जा चुकी है. केरल, तमिलनाडु, बंगाल और पांडुचेरी में रुपये किस रूप में काम करेंगे, कहना कठिन है.लेकिन भाजपा का नारा है-“हार बांटते चलो! बस हार बांटते चलो.

श्री राकेश अचल  ,वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनैतिक समीक्षक, मध्यप्रदेश  

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