लोकतंत्र-मंत्र

गनीमत है कि ट्रंप के ऊपर अदालत है

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आर्थिक नीतियों को झटका लगा है, क्योंकि अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने उनके ग्लोबल टैरिफ़ रद्द किए हैं. इस फैसले से डोनाल्ड ट्रंप साहब का दुखी होना लाजमी है, लेकिन इस एक फैसले ने दुनिया भर में अमरीकी न्यायपालिका की प्रतिष्ठा में चार चांद लगा दिए हैं. ऐसा भारत में तो पिछली आधी सदी में एक बार भी नहीं हुआ.अमरीकी सुप्रीम कोर्ट में 6-3 के बहुमत से टैरिफ़ के ख़िलाफ़ फ़ैसला दिया है. आपको याद होगा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले साल 10 से 50 प्रतिशत तक के टैरिफ़ लागू किए थे.ट्रंप ने 1977 के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकॉनॉमिक पावर्स एक्ट का इस्तेमाल करते हुए टैरिफ़ लगाए थे.ट्रंप ने दावा किया था कि उनके लागू किए गए टैरिफ़ से अमेरिकी फ़ैक्ट्रियों को फ़ायदा होगा और कामकाज को बढ़ावा मिलेगा.
                                          अगस्त 2025 में एक अमेरिकी अपील कोर्ट ने ट्रंप के ज़्यादातर टैरिफ़ ग़ैरक़ानूनी बताए, लेकिन इन्हें हटाया नहीं.टैरिफ़ को ग़ैरक़ानूनी बताने पर अपील कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ व्हाइट हाउस सुप्रीम कोर्ट गया थाइस मामले में सुप्रीम कोर्ट का दखल तब हुआ , जब व्हाइट हाउस ने अपील कोर्ट के फ़ैसले को पलटने की मांग की.अपने फ़ैसले में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रंप ने अपनी सीमा से बाहर जाकर अधिकारों का इस्तेमाल किया और नेशनल इमरजेंसी के लिए बने क़ानून का सहारा लिया. अमरीकी सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट राष्ट्रपति को टैरिफ़ लगाने की इजाज़त नहीं देता.इस ऐतिहासिक फैसले से डोनाल्ड ट्रंप के हाथों के तोते उड गए हैं.डोनाल्ड ट्रंप ने इस फ़ैसले को ‘शर्मनाक’ बताया है लेकिन वे फैसला देने वालों को न लोयागति प्रदान कर सकते हैं न किसी के पीछे अपनी जांच एजेंसियां छोड कर जजों को डरा सकते हैं.दोबारा टैरिफ भी नहीं लगा सकते.लेकिन ट्रंप साहब अदालत के फैसले से बंधे नहीं हैं. उन्होंने गुस्से में 10 प्रतिशत का ग्लोबल टैक्स और जड दिया. अब भारत को भी 18 के बजाय 28 फीसदी टैरिफ देना पडेगा.आपको याद दिला दूं कि डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से इस बात की चेतावनी दे रहे थे कि सुप्रीम कोर्ट का संभावित फैसला अमेरिका के लिए भयंकर परिणाम लेकर आएगा और उनके टैरिफ लगाने की क्षमता को सीमित करेगा.लेकिन ऐसा लगा जैसे सुप्रीम कोर्ट ने उनकी चिंताओं की ‘परवाह’ नहीं की और छह न्यायाधीशों ने राष्ट्रपति के ख़िलाफ़ फैसला सुनाया.न्यायाधीशों ने कहा कि टैरिफ लगाना राष्ट्रपति का काम नहीं है, बल्कि यह कांग्रेस की शक्ति है और जिस कानून का ट्रंप ने अपनी कानूनी रक्षा में हवाला दिया, यानी 1977 का इमरजेंसी इकॉनॉमिक पावर्स एक्ट, उसने ट्रंप को इतनी व्यापक शक्तियां नहीं दी थीं.
                                         ऐसा माना जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला राष्ट्रपति के कार्यकारी अधिकार के व्यापक इस्तेमाल पर रोक का प्रतीक है.मजे की बात ये है कि पिछले साल देश के अधिकांश न्यायाधीश ट्रंप के एजेंडे के पक्ष में दिखाई दे रहे थे, लेकिन टैरिफ के फैसले ने सब कुछ बदल दिया.ट्रंप के आप्रवासन और संघीय सरकार को पुनर्गठित करने के मामलों में कई अपीलों पर कोर्ट में सुनवाई जारी थी. जन्म अधिकार नागरिकता को समाप्त करने की ट्रंप की कोशिश और कथित अनियमितताओं के आधार पर फेडरल रिजर्व गवर्नर को हटाने की कोशिश पर भी विवाद जारी है. मुमकिन है इन मोर्चों पर भी आने वाले महीनों में ट्रंप को कोर्ट से झटका लगे. अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले का भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर असर होगा या नहीं ये बाद की बात है, लेकिन जानकर कहते हैं कि रेसीप्रोकल टैरिफ़ हट जाने से अब भारत को अमेरिका के कुल निर्यात के 55 फ़ीसदी हिस्से पर अब 18 प्रतिशत टैक्स नहीं देना होगा. यानी अब उन पर स्टैंडर्ड एमएफ़एन टैरिफ़ ही लगेंगे.भारत के बाक़ी निर्यात पर सेक्शन 232 के तहत टैरिफ़ जारी रहेंगे.यानी स्टील औरएल्युमीनियम पर 50 फ़ीसदी और कुछ ऑटो कंपोनेंट्स पर 25 प्रतिशत टैक्स लगेंगे.
अमरीका के सबसे बडे न्यायिक मंच के फैसले से भारतीय न्यायपालिका को भी कुछ सीखना चाहिए. सरकार के सुर में सुर मिलाने या आधे-अधूरे फैसले देने से देश का और लोकतंत्र का भला नहीं होता. देश का भला सत्ता की निरंकुशता पर अंकुश लगाने से होता है. दुर्भाग्य है कि भारत में न्यायालय समेत तमाम चीजें अमेरिका के मुकाबले हजारों साल पुरानी होने के बावजूद उनमें इतना इकबाल नहीं बचा है कि वे सत्ता की स्वच्छाचारिता पर लगाम लगा सकें.जाहिर है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ट्रंप साहब न पद से इस्तीफ़ा देंगे और न गम में आत्महत्या करेंगे लेकिन वे ये तो जान गए होंगे कि वे ही सब कुछ नहीं हैं. वे ही अमेरिका का शुभ नहीं सोचते. उनके ऊपर अदालतें भी हैं, जो उनसे ज्यादा देश का शुभ चिंतन करती हैं. मुझे उम्मीद है कि भारत की सबसे बडी अदालत पर भी अमरीकी सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले का रत्ती, दो रत्ती मनोवैज्ञानिक असर तो होगा.
श्री राकेश अचल  ,वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनैतिक समीक्षक, मध्यप्रदेश

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