सम्पादकीय

सामाजिक बात का राजनैतिक बतंगड़ क्या सही है !

 राजनीति और समाज एक ही सिक्के के दो पहलू भी है और एक दूसरे के पूरक भी एक राजनेता का समाज के प्रति दृष्टिकोण ही उसे प्रभावी बनाता है तो समाज का अपने नेता पर विश्वास ही राजनैतिक विचारधारा को मजबूत बनाता है लेकिन क्या आज सोशल मीडिया के इस वायरल युग में यह परस्पर वैचारिक आदान प्रदान भी अस्वीकार हो गया है । यह सवाल इसलिये उठता है क्योकि बीते दो दिनो से मध्यप्रदेश की राजनीति में एक नया ही मुद्दा छाया हुआ है मध्यप्रदेश के पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री  और भाजपा के वरिष्ठ नेता प्रहलाद पटेल इन दिनों सोशल मीडिया पर जमकर ट्रोल हो रहें है और वजह है कि राजगढ़ जिले के सुठालिया ग्राम में लोधी समाज के कार्यक्रम में दिया गया उनका एक बयान जिसका एक हिस्सा सुनने पर यह चुभता भी है लेकिन जब इस तर्क को आज के परिदृश्य में तौला जाता है तो इसकी गंभीरता का भान भी होता है मुख्य अतिथि के रूप में समाज को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा अब तो लोगों की सरकार से भीख मांगने की आदत सी पड़ गई है नेता आते है और उन्हें टोकना भर के मांग पत्र मिल जाते है माला पहना देगें और एक मांगपत्र पकड़ा देंगे यह अच्छी आदत नहीं है लेने के बजाए देने का मानस बनाए यह भिखारी की फौज इकट्ठी करके समाज को मजबूत करना नहीं है समाज को कमजोर करना है मुफ्त की चीजों के प्रति इतना आकर्षण रखते है यह वीरांगनाओं का सम्मान नहीं है। इस बयान को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने भाजपा और पटेल पर अधिकारी होने और जनता को भिखारी कहने के आरोप लगाये  हालांकि बाद में पटेल ने इस बयान पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करते हुए कहा कि यह एक सामाजिक कार्यक्रम था किसी पार्टी का नहीं था और बतौर मुख्य अतिथि मैने कार्यक्रम में आये अपने सहजन और युवाओं को स्वाभिमान की सीख दी है और आगे भी देता रहूंगा ।

                  पटैल के बयान पर राजनीति अपनी जगह है लेकिन पिछले एक दशक में क्या सरकारों द्धारा जनकलयाण के लिये चलाई जाने वाली योजनाए समाज को कमजोर नहीं बना रहीं है क्या आज के गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों के युवाओ में अपने कैरियर और भविष्य को लेकर वह चिंतायें है जो दो दशक पहले हुआ करती थी या इन योजनाओं ने बेरोजगारी के इस भीषण दौर में भी स्वावलंबी बनने के अनेक छोटे प्रयासों पर कुठाराघात किया है यह एक अध्ययन का विषय है देश की सर्वोच्च अदालत मुफत की योजनओं को लेकर सरकारों पर सख्त टिप्प्णी कर चुकी है सुप्रीम कोर्ट ने और प्रधानमंत्री मोदी भी रेवड़़ी कल्चर को देश के विकास के लिये खतरनाक बता चुके है । लेकिन वर्तमान राजनैतिक हालातों में मुफत की योजनाओं का कवच पहने बिना आप राजनीति के मैदान में नहीं लड़ सकते इसलिये दल चाहे कोई भी हो सभी इसी कल्चर के सहारे है और इस सोच को हराने या हटाना तो दूर इस पर अपने विचार रखना भी राजनैतिक अपराध की तरह हो गया है ।

अभिषेक तिवारी

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