लोकतंत्र-मंत्र

चैनल बिका है, रवीश कुमार नहीं…

आपको जानकर हैरानी होगी कि मुझे नियमित पढ़ने वाले शताधिक मित्रों ने आग्रहपूर्वक कहा कि मैं एनडीटीवी और रवीश कुमार पर लिखूं। चूंकि इस विषय पर विद्वानों और जानकारों ने पहले ही इतना लिख दिया था कि मुझे इस विषय से परे रहना ही उचित लगा। लेकिन मित्रों का आग्रह मै भला कैसे ठुकराता ? एनडीटीवी और रवीश कुमार उम्र में मुझसे काफी छोटे हैं किन्तु उनकी पहुंच और मारक क्षमता अनंत रही। एनडीटीवी 1984 में जन्मा और 2003 मे जगत व्यापी हो गया। एनडीटीवी की पहचान तब बहुत धीमी आवाज में बोलने वाले भद्र प्रणय राय हुआ करते थे।तब वे सत्ता की आंख की किरकिरी नहीं लेकिन जनता की आंखों का सुरमा जरूर थे।वे जो दिखा रहे थे उसे कोई दूसरा नहीं दिखा रहा था। एनडीटीवी ने देश की सेवा मुफ्त में नहीं की लेकिन अपनी रीढ़ को बचाकर रखा। ये पूंजी कंपनी की 400 करोड़ की पूंजी तथा 80/90 करोड़ रुपए की पूंजी से कहीं ज्यादा कीमती है।इस पूंजी का एक हिस्सा रवीश कुमार की कलम, आवाज और प्रस्तुति भी है।47 साल के रवीश कुमार शायद 1994 में एनडीटीवी से जुड़े थे।उनका नसीब था कि उन्हें अपने आपको प्रमाणित करने के लिए वो कालखंड मिला जो आजादी के बाद का सबसे जटिल, खौफनाक और असह्य माना जाता है। जब देश में एनडीटीवी नहीं था तब भी प्रतिकार के स्वर थे।एक नहीं अनेक रवीश कुमार थे।तब एनडीटीवी की आज की भूमिका में इंडियन एक्सप्रेस और जनसत्ता था।

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दरअसल प्रतिकार की पत्रकारिता हमेशा से सत्ता की आंख की किरकिरी और जनता की आंखों का सुरमा रही है। सत्ता किरकिरी से परेशान रहती है और जनता सुरमें से आराम महसूस करती है। देश में आपातकाल की अपराधी कांग्रेस के पराभव के बाद सत्ता और प्रतिकार की पत्रकारिता में जब द्वंद्व तेज हुआ तब कमजोर मेरूदंड वाले संस्थान और पत्रकार कतारबद्ध होकर सत्ता की गोद में समा गए।इस नयी जमात को नाम मिला ‘ गोदी मीडिया ‘। देश में पहली बार मीडिया का विभाजन हुआ। आपातकाल में भी कांग्रेस में सब नहीं कर पाई थी। वर्ष 2014 के बाद प्रतिकार की पत्रकारिता और सत्ता के बीच की विभाजक रेखा साफ हो गई। कुछ रवीश कुमार बन गये, कुछ नहीं बने।जो नहीं बने उन्हें रमन मैग्सेसे पुरस्कार नहीं मिला।लोक स्वीकृति नहीं मिली।’जस,जब सुरसा बदन बढ़ावा,तासु दून कपि रुप दिखावा ‘का दृश्य साफ नजर आने लगा। सत्ता की सुरसा जब प्रतिकार के हनुमान के सामने पराजित होने लगी तो उसने सीधे रवीश कुमार (जो अब प्रतीक है)को नाथने के बजाय उन्हें रोजीरोटी देने वाली कंपनी को ही नाथने की घटिया कोशिश की। प्रतिकार को स्वर देने वाली एनडीटीवी किसी सत्ता संरक्षित धनपति की बांदी हो गई। लेकिन इसमें अब कोई रवीश कुमार नहीं है। रवीश कुमार सड़कों पर है। सोशल मीडिया पर है। रवीश कुमार की पहुंच भले ही पहले के मुकाबले आधी से भी आधी नहीं बचेगी, किंतु रवीश कुमार बचा रहेगा। सत्ता की आंख की किरकिरी बना रहेगा। जिस दिन रवीश कुमार बिकेगा उसे पूछने वाला कोई नहीं होगा। हमें फख्र है कि रवीश कुमार बाजार से निकल कर सीधा जनता के बीच आ गया। बीते 18 साल में एनडीटीवी ने रवीश कुमार को इतना तो वेतन दे दिया है कि वह अपनी बाकी की जिंदगी बिना बिके काट लें।बेहतर हो कि रवीश कुमार के बेरोजगार होने पर खुशियां मनाते लोग अपना मेरूदंड भी टटोल लें। रवीश कुमार को जन्म दिन की अग्रिम शुभकामनाएं।

व्यक्तिगत विचार-आलेख-

श्री राकेश अचल जी ,वरिष्ठ पत्रकार , मध्यप्रदेश  । 

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