नई दिल्ली। भारतभवः
कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की कीमतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी चिंता जताई है। अदालत के सामने एक ऐसा मामला आया जिसमें एक कैंसर की दवा की कीमत रिटेलर के लिए करीब ₹2,700 थी, जबकि उसका MRP ₹27,000 बताया गया। यानी कीमत में लगभग दस गुना का अंतर। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने सवाल उठाया कि जीवनरक्षक दवाओं की कीमत में इतना बड़ा अंतर क्यों होना चाहिए और इसका बोझ आखिर मरीजों पर क्यों पड़े। अदालत ने दवाओं पर एक समान 16 प्रतिशत मार्जिन की व्यवस्था की संभावना पर केंद्र सरकार से विचार करने को कहा है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने उन आरोपों पर भी चिंता जताई कि कुछ निजी अस्पताल मरीजों को अपनी या निर्धारित फार्मेसी से ही दवाएं खरीदने के लिए बाध्य करते हैं। अदालत ने कहा कि यदि मरीज सरकारी स्वास्थ्य योजना के तहत इलाज करा रहा है तो बढ़ी हुई कीमत का आर्थिक बोझ अंततः सरकारी धन और करदाताओं पर भी पड़ सकता है।केंद्र की ओर से अदालत को बताया गया कि इस मामले में संबंधित अधिकारियों के साथ विचार-विमर्श की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को इस मुद्दे पर जवाब देने के लिए समय दिया है और मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर 2026 को निर्धारित की गई है।
गौरतलब है कि कैंसर का इलाज पहले ही लंबे और महंगे उपचार से जुड़ा होता है। ऐसे में दवा की खरीद कीमत और मरीज से वसूले जाने वाले MRP के बीच बड़ा अंतर स्वास्थ्य व्यवस्था में पारदर्शिता और मूल्य नियंत्रण पर गंभीर सवाल खड़े करता है।हालांकि, अभी सुप्रीम कोर्ट ने कोई अंतिम मूल्य-सीमा लागू नहीं की है। 16 प्रतिशत मार्जिन का मुद्दा फिलहाल अदालत द्वारा केंद्र के सामने विचार के लिए उठाया गया प्रस्ताव/सवाल है। अंतिम निर्णय और सरकार की प्रतिक्रिया आगे की सुनवाई में स्पष्ट होगी।
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