राजनीतिनामा

मध्यप्रदेश राजनीतिनामा : संपर्क से सस्पेंस…

राजनीति में कहा जाता है कि जैसा दिखता है वैसा होता नहीं और जो होता है वह दिखता नहीं।  मध्यप्रदेश की राजनीति भी कुछ इसी तरह हो गई है कौन कब कहां चला जाए कुछ कहा नहीं जा सकता लेकिन उससे भी ज्यादा कौन आने-जाने को किसको डराए या  सही में दलबदल हो जाए यह भी सस्पेंस ही रहता है दरअसल भाजपा में सत्ता और संगठन में फेरबदल की संभावना है और कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा के प्रदेश में आने के पूर्व ही प्रदेश की सियासत ठंड के मौसम में गरमाने लगी है जहां भाजपा का दावा है कि कांग्रेस के विधायक भाजपा में आने के लिए उसके संपर्क में है तो कांग्रेसी भी दावा कर रही है कि भाजपा से कांग्रेसमें आने वाले भी नेता हमारे संपर्क में है इसी कारण दोनों और सस्पेंस का माहौल है क्योंकि कभी ना कभी दोनों ही दल ऐसा कर चुके हैं।

यहाँ बताते चलें कि 2018 के बाद जब कांग्रेस की सरकार बनी तब विधानसभा के अंदर विपक्षी दल भाजपा के अंदर वोटिंग की मांग नहीं की थी इसके बावजूद भी कांग्रेस सरकार ने वोटिंग इसलिए कराई थी क्योंकि उनके पास भाजपा के दो विधायक पहुंच चुके थे नारायण त्रिपाठी और शरद कांग्रेस का साथ दिया था और यह भी कहा जाता है कि यदि कांग्रेस की सरकार नहीं गिरती तो बाद में भाजपा के 15 से ज्यादा विधायक और कांग्रेसमें जा सकते थे भाजपा विधानसभा में 2 विधायकों के कांग्रेस के साथ मतदान में जाने के बाद सतर्क और सावधान हो गई इसके पहले कि कांग्रेसी और भाजपा विधायकों को तोड़ते भाजपा ने कांग्रेस के 22 विधायकों और ज्योतिरादित्य सिंधिया को तोड़ दिया और कांग्रेसी सरकार गिरा दी इन दोनों घटनाओं के समय कांग्रेस ने तब कहा था कि भाजपा के विधायक हमारे संपर्क में हैं और भाजपा ने तो बड़े गुपचुप तरीके से विधायकों को जब बेंगलुरु पहुंचा दिया तब खबर लगने दी बाहर हाल के द्वारा एक-दूसरे के नेताओं के संपर्क में होने का दावा किया जा रहा है । कि जब संपर्क में थे तब दोनों दलों ने दावा नहीं किया था अभी दावा कर रहे हैं तो इसमें कितनी सच्चाई है?

 हलाकि दलबदल देश की राजनीति में अब कोई मुद्दा नहीं रहा कोई कहीं भी जा सकता है इससे उसकी कोई फर्क नहीं पड़ता यदि राष्ट्रपति के चुनाव में कांग्रेश के लगभग 18 विधायकों ने राष्ट्रपति के चुनाव में क्रॉस वोटिंग की थी और तब से ही कयास लगाए जा रहे हैं इन विधायकों में से कुछ कभी भी भाजपा में जा सकते हैं और भाजपा हमेशा ऐसे अवसर की तलाश में रहती है जब दलबदल का उपयोग कांग्रेश के गुब्बारे को फोड़ने के लिए किया जाता है जब-जब उपचुनाव में भाजपा ने कांग्रेस विधायकों का दलबदल कर आया इस कारण भाजपा के दावे को खोखला नहीं कहा जा सकता क्योंकि भारत जोड़ो यात्रा जब 23 नवंबर को प्रदेश में प्रवेश करेगी तब उस माहौल की हवा निकालने के लिए कुछ विधायकों को दलबदल करा सकती है मंत्री भूपेंद्र से जिस तरह से मीडिया के सामने कहा है उसके बाद कांग्रेसी और भी सतर्क और सावधान हो गई है और अपने सभी विधायकों पर नजर रख रही है ऐसा नहीं है कि केवल कांग्रेसी रही है भाजपा को भी आशंका है कि कहीं भाजपा के नेता भी कांग्रेसमें ना चले जाएं क्योंकि कमलनाथ के प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए कुछ भी हो सकता है 2018 के विधानसभा के चुनाव के पहले रामकृष्ण कुसमरिया और जैसे नेताओं की भाजपा छोड़ना किसी आश्चर्य से कम नहीं था विधायक संजय शर्मा का पार्टी छोड़ना भी भाजपा को संकेत दे गया था कि अब भाजपा में भी संकोच नहीं रहा जो पहले कभी हुआ करता था यही कारण है कि सत्ता और संगठन हर कदम फूंक-फूंक कर रख रही है इसी कारण मंत्रिमंडल के विस्तार और संगठन में होने वाले बदलाव को धीरे-धीरे किया जा रहा है हाल ही में संपन्न त्रिस्तरीय पंचायती राज और नगरी निकाय के चुनाव परिणाम ने साबित  कर दिया है कि भाजपा यदि ओवरकॉन्फिडेंस में रहे तो कर 2018 जैसी स्थिति बन सकती है खासकर जनाधार वाले नेताओं को संभाल कर रखना पार्टी के सामने बड़ी चुनौती है कुल मिलाकर जिस तरह से विधानसभा चुनाव 2023  और लोकसभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं एक दूसरे के नेताओं के संपर्क में होने के दावे जहां सस्पेंस बढ़ा रहे हैं वहीं दोनों ही दलों को सतर्क और सावधान रहने के लिए मजबूर भी कर रहे हैं।

 

          देवदत्त दुबे 

वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनैतिक विश्लेषक मध्यप्रदेश 

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