दुनिया

फोकट का गर्व,या असली ?

ऋषि सुनक इंग्लैंड के प्रधानमंत्री क्या बने भारतीय भक्त मंडल खुशी से भरत नाट्यम करता नजर आ रहा है।हर असली भारतीय को लग रहा है कि ऋषि ने अंग्रेजी कौम से आखिर बदला ले ही लिया। अंग्रेजों ने भारत पर 200 साल शासन किया था, ऋषि दो सौ दिन भी कर लें तो बड़ी बात है। हम भारतीय भूल जाते हैं कि ऋषि बाबू अव्वल तो भारतीय नहीं हैं,वे भारतीय मूल के हैं।उनका डीएनए कभी का आंग्ल हो चुका है। उसमें भारत का ‘ भ’ भी शेष नहीं है। हम ये भी भूल जाते हैं कि ऋषि बाबू संयोगवश प्रधानमंत्री बने हैं न कि जनादेश से। हमारे देश में विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर,एचडी देवगौड़ा और इंद्रकुमार गुजराल जैसे प्रधानमंत्री बने थे, वैसे ही ऋषि बाबू हैं।वे अपने देश की मौजूदा तस्वीर नहीं बदल सकते।देश की तस्वीर सनक या सुनक से नहीं दूर दृष्टि,पक्के इरादे से बदली जाती है।
सुनक के हाथ में एक अशांत इंग्लैंड आया है। इंग्लैंड का पाउंड भी भारतीय रुपए की तरह लगातार कमजोर हो रहा है।ऋषि बाबू के पास देश की अर्थव्यवस्था सुधारने और बेरोज़गारी से निबटने के लिए जादू की कोई छड़ी नहीं है। फिर भी हमारी शुभकामनाएं ऋषि बाबू के साथ हैं। हमारे प्रधानमंत्री की शुभकामनाएं ऋषि बाबू के साथ हैं ही। बात ऋषि के इंग्लैंड के प्रधानमंत्री बनने पर भारत में हुई प्रतिक्रिया की है।
आखिर ऋषि से भारत का रिश्ता क्या है?भारत में वे जन्मे नहीं, पढ़ें नहीं।वे केवल भारतवंशी हैं।भारतवंशियों की तो दुनिया भर में उपस्थिति है।वे दुनिया के अनेक देशों में वे उच्च पदों पर हैं, लेकिन वे भारत के लिए मुफीद नहीं हैं। इसलिए ऋषि को लेकर हम मन के लड्डू फोड़ रहे हैं।मन के लड्डुओं में न बेसन होता है न शक्कर। विसंगति ये है कि हम वास्तविकता से परे जीने के आदी हो गए हैं। हमें शिगूफो के साथ जीने के आदी हो चुके हैं। पिछले 75साल मे हम इस शिगूफेबाजी के बाहर नहीं आ सके। हमें ऋषि बाबू जैसे प्रधानमंत्री चाहिए। हमलों वो प्रधानमंत्री पुसाते हैं जो हवा हवाई हों। हकीकत ये है कि ऋषि सुनक का भारतीयता से कोई लेना देना नहीं है सिवाय इसके कि वे ऋषि सुनक इन्फ़ोसिस के संस्थापक एनआर नारायण मूर्ति के दामाद हैं।वे गरीब भी नहीं है।उनकी पत्नी अक्षता मूर्ति ब्रिटेन की सबसे अमीर महिलाओं की सूची में शामिल हैं। सुनक बोरिस जॉनसन कैबिनेट में वित्त मंत्री थे
2015 से सुनक यॉर्कशर के रिचमंड से कंज़र्वेटिव सांसद चुने गए थे।उनके पिता एक डॉक्टर थे और माँ फ़ार्मासिस्ट भारतीय मूल के उनके परिजन पूर्वी अफ़्रीका से ब्रिटेन आए थे ऋषि ने पढ़ाई ख़ास प्राइवेट स्कूल विंचेस्टर कॉलेज में हुई
उच्च शिक्षा के लिए सुनक ऑक्सफ़र्ड गए।बाद में स्टैनफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में एमबीए भी किया वे राजनीति में आने से पहले इन्वेस्टमेंट बैंक गोल्डमैन में काम किया।इन तथ्यों में से एक भी ऐसा नहीं है जो ऋषि को भारत से जोड़ता हो। लेकिन ऋषि हमें अपने लगते हैं तो लगते हैं। कोई क्या कर सकता है ?
ऋषि सुनक अपनी नियुक्ति के एक घंटे के भीतर ही एक्शन में नजर आए. उन्होंने अपने नए मंत्रिमंडल की घोषणा से पहले पूर्व पीएम लिज ट्रस की मंत्रियों की टीम के कई सदस्यों से इस्तीफा देना के लिए कहा. ऋषि सुनक पर गर्व इसलिए नहीं किया जा सकता क्योंकि वे उसी राजशाही के नौकर हैं जिसने भारत को दो सौ साल गुलाम बना कर रखा। ऋषि अभी 25 अक्तूबर को ही किंग चार्ल्स तृतीय को कोर्निश बजाकर आए हैं।वे आखिर हमारे लिए गर्व का विषय कैसे हो सकते हैं ? हमारे लिए गर्व का विषय वे भारतवंशी हैं जो सतत अपनी जड़ों से जुड़े हैं। हमने इससे पहले कमला हैरिस के अमेरिका के उप राष्ट्रपति बनने पर गर्व करके देख लिया। आखिर क्या मिला भारत को कमला की वजह से ? लेकिन हम तो हम हैं। किसी भी बात पर गर्व कर सकते हैं। भगवान को लोक बनाकर भी और अयोध्या में दीपोत्सव का कीर्तिमान बनाकर भी।हम क्षुधा सूची में 107 वे स्थान पर आकर भी कहां दुखी होते हैं?

व्यक्तिगत विचार-आलेख-

श्री राकेश अचल जी ,वरिष्ठ पत्रकार , मध्यप्रदेश  ।

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