नागपुर, रीवा ,इंदौर और ग्वालियर से सरकारी रिकार्ड का भोपाल स्थानांतरण करना बहुत बड़ी चुनौती थी। ऐसा किया जाना आवश्यक भी था और समय पर होना और भी जरूरी कई राज्यों के दस्तावेज का घालमेल इससे समझा जा सकता है कि जब मध्य भारत के एक पत्थर खदान के मालिक ने लीज का नवीनीकरण मांगा तो उनसे कह दिया गया कि पहले वह खदान से संबंधित पुरानी बस्ती रेलवे स्टेशन पर पड़े तीनों वैगनों में से ढूंढ कर लाए जो मध्य भारत से आई है। पूरे साल मध्य भारत की फाइलें स्टेशन पर पड़ी रही क्योंकि उन्हें रखने के लिए जगह तैयार नहीं हो रही थी। हालांकि मध्यभारत जैसे बड़े राज्यों में ब्रिटिश भारत की तरह सरकारी कामकाज की प्रणाली लागू थी पर छोटे राज्यों में पूरा तंत्र निजी जागीर की तरह चलता था।
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ग्वालियर भोपाल और इंदौर की सिविल सेवा तो व्यवस्थित थी पर बाकी जगह का हाल बुरा था इन राज्यों में अधिकारियों को राजाओं की मर्जी के मुताबिक बेहिसाब तनख्वाह दी जाती थी क्योंकि यह अधिकारी कम दरबारी ज्यादा थे। सभी राज्यों में दीवानी पुलिस और न्यायिक व्यवस्था के अलग-अलग कानून थे जिन्हें एक सूत्र में पिरोना सामान्य प्रशासन विभाग का काम था राज्यों के संविलियन के समय प्रशासनिक अधिकारियों के पदनाम में एकरूपता लाने के लिए बदले गए जैसे डिप्टी कमिश्नर को कलेक्टर कर दिया गया, एडिशनल डिप्टी कमिश्नर एडिशनल कलेक्टर हो गए ,असिस्टेंट कमिश्नर असिस्टेंट कलेक्टर हो गए न्याय प्रशासन के साथ भी यही दिक्कत थी । अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तरह के कानून उच्च न्यायालय और नीचे की अदालतों में प्रचलित थे इन सबको मध्यप्रदेश दीवानी अधिनियम के अंतर्गत लाकर न्यायिक प्रशासन में एकरूपता लाई गई।
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