राजनीतिनामा

डूबती नावों का नया तिनका हैं सिंधिया !

मध्य प्रदेश की सियासत में दूसरे राज्यों जैसी तड़क भड़क नहीं है। यहां कोई भी राजनीतिक दल हो, सामंतों की गणेश परिक्रमा किए बिना उनका काम नहीं चलता। आजकल पूर्व ग्वालियर रियासत के प्रमुख रहे सिंधिया सत्तारूढ़ भाजपा की डूबती नावों के लिए तिनका बनते नजर आ रहे हैं। लेकिन क्या सिंधिया में इतना दमखम है कि वे भाजपा के खुरखेंच समूह की अगुवाई कर सकें? अगले 17नबंवर से दीदी उमा भारती से दीदी मां बनने के साथ यदि राजनीति से विरत हो गई तो अलग बात है, अन्यथा उन्हें भी सूबे में अपने दुश्मनों को चमकाए रखने के लिए सिंधिया की चमक की जरूरत तो पड़ेगी ही। दीदी मां इस समय देश और भाजपा की राजनीति में हासिए पर डाल दी गई हैं। अतीत में झांक कर देखिए तो आपको पता चलेगा कि उमा भारती की राजनीति की मूल ही सिंधिया के महल में है। ज्योतिरादित्य सिंधिया की दादी राजमाता विजया राजे सिंधिया ने ही उमा भारती को राजनीति का ककहरा सिखाया था। महल के प्रति यही पुरनी आशक्ति उमा भारती को मजबूर करती है वे सिंधिया को ‘ हीरा ‘ कहें।ऐसा उन्होंने किया भी है।

मध्य प्रदेश की राजनीति में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का राजपाट हासिल करने के लिए सबसे ज्यादा उतावले नेता कैलाश विजयवर्गीय ने भी सिंधिया के पीछे खड़े नजर आते हैं। कैलाश विजयवर्गीय सभी तरह के बलों में उमा भारती और ज्योतिरादित्य सिंधिया से कम नहीं है। फिर भी कैलाश विजयवर्गीय का दिल्ली में कोई प्रमाणिक माई बाप कोई नहीं है। कैलाश विजयवर्गीय यदि उमा भारती की तरह ही  उतावले होकर बागी हो जाते तो कहीं के नहीं रहते। सिंधिया इस समय भाजपा के असंतुष्टों के लिए शहद के छत्ते के समान हैं। चाहे अनचाहे सबको सिंधिया की जरूरत है। सिंधिया के लिए भी इनकी उपयोगिता है, किंतु सिंधिया एक सीमा से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं।वे असंतुष्टों के साथ तो हैं किन्तु मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ भी खुलकर खड़े नहीं हो रहे हैं। आगामी विधानसभा चुनाव तक शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ खड़े होने का साहस शायद वे जुटा सकें, क्योंकि अभी सिंधिया की नाव खुद भंवर में हैं। मप्र की राजनीति छग और राजस्थान से एकदम अलग है और यहां सत्ता का संतुलन क्षेत्रीय क्षत्रप नहीं बल्कि पार्टी हाईकमान तय करता आया है। भाजपा और कांग्रेस दोनों में ये स्थिति एक जैसी है। फर्क सिर्फ इतना है कि भाजपा में विकल्प है और कांग्रेस में नहीं।

भाजपा के मनमोहन सिंह यानि केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर मप्र की राजनीति में एकदम सुरक्षित खेल, खेल रहे हैं। उन्हें पता है कि मप्र में एक बार दो फांक हो चुकी भाजपा अब दोबारा नहीं टूटेगी।और जब भी कोई बखेड़ा खड़ा होगा भी तो राजनीति का जुआ उन्ही के कंधों पर रखा जाएगा। मजे की बात ये है कि भाजपा हाईकमान को मप्र के असंतुष्टों के इर्दगिर्द खड़े होने की पूरी खबर है, लेकिन अभी तक दिल्ली ने सिंधिया को टोका नहीं है। दिल्ली जानती है कि सिंधिया कितने दमखम वाले हैं।अब उन्हें भाजपा में भाजपा के तौर-तरीकेसे रहना पड़ेगा। वे जो हिम्मत कांग्रेस हाईकमान के सामने दिखा चुके हैं,वैसी हिम्मत वे सपने में भी भाजपा हाईकमान के सामने नहीं दिखा सकते। मुझे तो इस बात में भी शंका है कि वे हाईकमान के सामने असंतुष्टों की पैरवी भी कर पाएंगे या नहीं ? सिंधिया को भाजपा में आए अब पूरे दो साल से ज्यादा वक्त हो चुका है।वे भाजपा में अपने तमाम अतीत को दांव पर लगाकर शामिल हुए हैं।वे भाजपा के कार्यकर्ता की तरह काम कर चुके हैं। भविष्य में क्या वे पहले वाले सिंधिया बन सकेंगे यही देखना रोचक होगा।वे भाजपा में अपनी प्राण प्रतिष्ठा होते देखने के साथ ही अपनी बुआ बसुंधरा राजे की फजीहत भी देख रहे हैं।

 

व्यक्तिगत विचार-आलेख-

श्री राकेश अचल जी ,वरिष्ठ पत्रकार , मध्यप्रदेश  । 

 

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