उसी साल मार्च में मुकेश अंबानी के रिलायंस समूह ने मध्यप्रदेश में रिलायंस फ्रेश स्टोर्स चालू किये और भोपाल में नौ प्रतिष्ठान खोले। जब यह स्टोर खुलने वाले थे तो बाकायदा उमा भारती ने उनका विरोध जताने के लिए धरना देकर तोड़-फोड़ की। उनका तर्क था कि इस तरह के व्यापार से छोटे व्यापारी समाप्त हो जायेंगे। उनका यह विरोध ज्यादा दिन नहीं चला। फिर अचानक वे चुप हो गई। उन दिनों उमा भारती जनशक्ति पार्टी चला रहीं थीं और संसाधनों के लिए बहुत परेशान रहती थीं। संसाधनों की कमी और उमा भारती की हठधर्मिता के कारण नई पार्टी में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा था। पार्टी के बड़े नेता आपस में सामंजस्य नहीं बिठा पा रहे थे। प्रहलाद पटेल और उमा भारती का एक जैसा स्वभाव होने के कारण अक्सर मनमुटाव हो जाता, वहीं पार्टी के महामंत्री रघुनंदन शर्मा ने भी अपनी अलग राह चुन ली। इसके पहले रघुनंदन शर्मा ने शिवराज सिंह द्वारा खाली की गई विदिशा लोकसभा सीट पर जनशक्ति पार्टी के प्रत्याशी के तौर पर अच्छी टक्कर भाजपा को दी थी। बाद में जिस तरह का समर्थन जनशक्ति को मिला उससे लगा कि उमा भारती ने स्वयं लोकसभा का वह उपचुनाव न लड़कर बड़ी ऐतिहासिक भूल की थी।
यदि उमा भारती तब विदिशा से उपचुनाव लड़तीं तो शायद जीत जातीं। लेकिन कहते हैं कि वे तब अनिल दवे से डर गई थीं। भाजपा ने उपचुनाव लड़ाने की जिम्मेदारी अनिल दवे को दी थी। उमा भारती, दवे की योग्यता से परिचित थीं। अनिल दवे ने उमा भारती को गुमराह कर भाजपा को चुनाव जितवाया या उमा भारती खुद नहीं लड़ना चाहती थीं, यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता, पर यह राजनैतिक भूल उमा भारती को बाद में बहुत भारी पड़ी। अंततः विदिशा लोकसभा और बड़ामलेहरा उपचुनाव, जो उमा भारती के विधानसभा से इस्तीफे के कारण खाली हुई थी दोनों ही सीटें जनशक्ति पार्टी नहीं जीत पाई। उमा भारती और भाजपा के इस टकराव से संघ बहुत नाराज़ था। संघ ने पाँचजन्य के एक लेख के माध्यम से नसीहत दी कि दोनों को हिन्दुत्व की खातिर एक हो जाना चाहिए पाँचजन्य ने बड़ामलेहरा उपचुनाव पर लिखा कि भाजपा की जीत स्वागत योग्य है किन्तु भगवा बनाम भगवा का परिदृश्य काफी पीढ़ादायक है।
वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनैतिक विश्लेषक
श्री दीपक तिवारी कि किताब “राजनीतिनामा मध्यप्रदेश” ( भाजपा युग ) से साभार ।
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