राजनीतिनामा

मध्यप्रदेश – दिग्गी राजा का वैराग्य भी हैरतंगेज

दो कम अस्सी के दिग्विजय सिंह इलियास दिग्गी राजा का हर कदम सुर्खी बन जाता है. वे चाहे चौथेपन में शादी करें, चाहे आर एस एस की तारीफ करें, चाहे फिर तीसरी बार राज्यसभा न जाने का ऐलान करें. सुर्खियां उनके साथ परछाई बनकर खडी रहती हैं.कुछ लोग दिग्विजय सिंह को मध्य प्रदेश की राजनीति का बेताज बादशाह कहते भी हैं और मानते भी हैं, लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता.. चूंकि पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का राज्यसभा का कार्यकाल अप्रैल 2026 में खत्म हो रहा है. लेकिन लगातार तीसरी बार राज्यसभा जाने से अपने कदम पीछे खींच कर फिर एक बार दिग्गी बाबा से त्यागी बाबा बनने की कोशिश की है.ये हकीकत है कि दिग्विजय सिंह ने राज्यसभा जाने से इनकार कर न सिर्फ अपने समर्थकों को ही हैरान नहीं किया बल्कि कांग्रेस के भीतर राज्यसभा की खाली होने वाली सीट के लिए सियासी जंग छेड़ दी है.आपको याद होगा कि दिग्विजय सिंह छह साल पहले राज्यसभा की इसी सीट को हासिल करने के लिए कमलनाथ की सरकार को गिराने के भी अपराधी हैं.उनकी वजह से ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस छोडी सो अलग.अब सवाल यह है कि आखिर दिग्विजय सिंह ने राज्यसभा जाने की हैट्रिक लगाने से इंकार क्यो किया? क्या उन्हे इस बात की आशंका है कि पार्टी हाईकमान तीसरी बार राज्यसभा नहीं भेजेगा?
                                     मप्र की राजनीति में पांच दशक पहले कदम रखने वाले दिग्विजय सिंह 2014 से राज्यसभा सांसद है. इससे पहले 1993 से 2003 तक लगातार दो कार्यकाल मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. 2003 में राज्य में कांग्रेस की सत्ता जाने के बाद, उन्होंने चुनावी राजनीति से एक दशक का सन्यास लिया था. वे 2013 में फिर सक्रिय राजनीति में वापस आए थे.पार्टी ने उन्हे राज्यसभा भेजा. इस बीच 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव में भी किस्मत आजमाई लेकिन दोनों ही बार हार गए.पराजय के बावजूद दिग्विजय सिंह कांग्रेस के दिग्गज बने रहे..दिग्विजय समर्थको को लगता है कि कांग्रेस दिग्विजय सिंह को एक बार फिर से मध्य प्रदेश के सियासी मैदान में उतार सकती है लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता. मुझे लगता है कि अब दिग्विजय सिंह नेपथ्य में ही रहकर बाकी के दिन गुजारेंगे.मजे की बात ये कि दिग्गी समर्थकों को अब भी लगता है कि पार्टी उन्हें मध्यप्रदेश में बड़े संगठनात्मक मिशन की जिम्मेदारी सौंप सकती है. आपको याद होगा कि दिग्विजय सिंह द्वारा वर्ष . 2017-18 में की गई 3300 किलोमीटर लंबी नर्मदा परिक्रमा कांग्रेस के लिए सत्ता में वापसी के लिए काफी मददगार साबित हुई थी. अब सवाल ये है कि क्या दिग्विजय सिंह में इतनी ऊर्जा बची है कि कांग्रेस 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले एक बार और कोई बड़ा जनसंपर्क अभियान दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में करा सके? , ये हकीकत है कि प्रदेश में का संगठन में बिखराव है. लेकिन क्या दिग्विजय सिंह बिखरे संगठन को जोड़ा कर युवा कार्यकर्ताओं को दिशा दे पायेंगे?
                                      मध्य प्रदेश में कांग्रेस लंबे समय से अपनी सियासी जमीन तलाश रही है. 2018 में कांग्रेस सत्ता में वापसी करने में जरूर कामयाब रही थी, लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थक विधायकों के बगावत के चलते कमलनाथ को अपनी सत्ता गंवानी पड़ गई थी. 2023 में कांग्रेस को मध्य प्रदेश में तगड़ा सियासी झटका लगा है. इस सबकी जड में कहीं न कहीं दिग्विजय सिंह ही हैं. ऐसे में पार्टी दिग्गी राजा को फिर से मौका देती है तो सभी को हैरानी होगी.राज्य की सत्ता से बाहर होने के चलते दो कांग्रेस संगठनात्मक रूप से खोखली हो गई है, जिसमें बूथ समितियां निष्क्रिय हैं, पार्टी में गुटबाजी भी जबरदस्त है. संसाधनों की कमी है, और 2020 में पार्टी बगावत का सियासी असर पड़ा है, जिसके चलते पार्टी को न केवल विधायक गंवाने पड़े बल्कि कार्यकर्ताओं का मनोबल भी टूटा है. इसके अलावा पार्टी का सियासी आधार भी खिसका है. इन सारी मसले को हल करे बिना राज्य में वापसी करना संभव नहीं है.
दिग्विजय सिंह के कदम खींचने के बाद कांग्रेस किसे राज्यसभा में भेजेगी ये अलग मुद्दा है. असली सवाल तो ये है कि क्या दिग्विजय सिंह शेष जीवन में का के लिए उपयोगी साबित होंगे या नहीं?
@ राकेश अचल

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