लोकतंत्र-मंत्र

जजों को धमकी, चेतावनी या और कुछ

केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू को मै बहुत नसीबों वाला नेता मानता हूं, हालांकि वे जितने पढ़े लिखे हैं उससे कहीं ज्यादा पढ़े लिखे नौजवान चप्पलें घिसते फिर रहे हैं, लेकिन राजनीति किरेन को ये मौका देती है कि वे देश की न्यायपालिका को आइना दिखाएं, चुनौती दें या परोक्ष रूप से धमकाएं। किरेन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मंत्रिमंडल के सदस्य हैं, वे जो कहते हैं उसे सरकार का और सरकारी पार्टी का कहा माना जाता है।किरेन ने कॉलेजियम को लेकर जारी विवाद के बीच एक बड़ा बयान दिया दिया है. उन्होंने एक टीवी चैनल पर कहा कि जजों को एक बार जज बनने के बाद आम चुनाव का सामना नहीं कर पड़ता है। उनकी सार्वजनिक जांच भी नहीं होती है. ऐसे में ये तो साफ है कि जजों को आम जनता नहीं चुनती है और यही वजह है कि जनता जजों को बदल भी नहीं सकती। किरेन न नाबालिग हैं और न अपरिपक्व, जानते हैं कि वे जो कह रहे हैं उसका क्या अर्थ है?किरेन को पता है कि जज भले ही चुनाव नहीं लड़ते, उन्हें हटाया नहीं जा सकता किन्तु जजों के लिए एक निश्चित चयन प्रक्रिया और न्यूनतम अर्हता होती है,जो मंत्री बनने के लिए नहीं होती। किरेन ने जजों को धमकाया कि इसका ये मतलब नहीं है कि जनता आपको देख नहीं रही है । ये सच है कि जज परम स्वतंत्र हैं, लेकिन नेताओं के मुकाबले उनकी स्वतंत्रता नगण्य है। जजों को अगर कोई नहीं देख रहा तो नेताओं को कौन देख रहा है? कौन सा कानून है जो भ्रष्ट, बेईमान, नाकारा जन प्रतिनिधि या मंत्री को पद से हटा सके? ऐसे कानून इस देश में बनने ही नहीं दिए गए। ऐसे में किरेन का मकसद समझने में किसी को कोई गफलत नहीं होना चाहिए। बीते आठ साल में मीडिया और फिल्म उद्योग को गोदी में बैठाकर बच्चों की तरह उन्हें दुलारने वाली सरकार अब गोदी न्यायपालिका भी चाहती है। देश के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश को राजसुख देकर सरकार ने अपनी कोशिश शुरू भी कर दी है। कार्यरत जज साहिबान अपने भविष्य को सुनिश्चित करने के लिए अजब -गजब फैसले करने लगे हैं, लेकिन जो ऐसा नहीं करना चाहते उन्हें किरेन जैसे मंत्रियों के जरिए धमकाया जा रहा है,आइने दिखाए जा रहे हैं।

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किरेन रिजिजू ने कहा एक बात जरूर कहा है कि आज जो सिस्टम चल रहा है उसपर कोई सवाल नहीं उठाएगा या फिर कोई सवाल नहीं उठेंगे, ऐसा सोचना गलत है । कई बार सिस्टम में बदलाव भी जरूरी होता है. हमारी सरकार और पहले की सरकारों ने जरूरत पड़ने पर संविधान के अनुच्छेद में भी बदलाव किया है. इसलिए कभी भी बदलाव को नकारात्मक तरीके से ही नहीं देखना चाहिए । उन्होंने कहा कि कॉलेजियम को लेकर जो बातें आज हो रही हैं वो निराधार हैं । किरेन चूंकि सरकार में हैं इसलिए वे न्यायपालिका को उसके उद्देश्य याद दिला सकते हैं कि जज साहबान आम आदमी और न्याय के बीच कोई गैप ना रहने दें । अब देखना यह है कि जज किरन की बात को गंभीरता से लेते हैं या नहीं ? किरेन और श्रीमती चिरई रिजिजू के घर एक अग्रणी परिवार में हुआ। उनके पिता अरुणाचल के पहले प्रो टर्म स्पीकर थे, जिन्होंने पहली राज्य विधानसभा के सदस्यों को शपथ दिलाई थी ।किरेन के पहले खुद प्रधानमंत्री परदेदारी के साथ न्यायपालिका को आइना दिखा रहे हैं। प्रधानमंत्री जी और किरेन रिजिजू में सिर्फ एक अंतर है कि किरेन की उपाधियां। संदिग्ध नहीं है वे अपने स्कूल के दिनों से एक सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता रहे हैं और उन्होंने एक सामाजिक कार्यकर्ता और छात्र नेता के रूप में विभिन्न सामाजिक आंदोलनों का नेतृत्व किया है। किरेन रिजिजू दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज से स्नातक हैं और कैंपस लॉ सेंटर, लॉ संकाय, दिल्ली विश्वविद्यालय से लॉ में स्नातक की डिग्री भी प्राप्त की है। भारतीय न्यायपालिका के सामने तमाम चुनौतियां पहले से है विश्वसनीयता का संकट है।किरेन के बोल ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। देश के मुख्य न्यायाधीश को भी किरेन की बात को संज्ञान में लेना चाहिए,। क्योंकि किरेन की बात हलके में लेने लायक नहीं है।किरेन के तेवर खतरनाक है।अब अगर बात बढ़ी तो आगे भी जाएगी। अगले चुनाव में ये टकराव भी मुद्दा बनना चाहिए। राजनीतिक दलों का नजरिया साफ होना चाहिए अन्यथा सरकार और न्यायपालिका के बीच टकराव और बढ़ेगा जो लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक है। पिछले दिनों कालेजियम सिस्टम को लेकर सरकार और न्यायपालिका में तनातनी सबने देखी। मुख्य न्यायाधीश का हस्तक्षेप भी कोई भूला नहीं होगा। उन्होंने विवाद कम करने के लिए अपनी तरफ से स्वागत योग्य पहल की है।अब देखना ये है कि आने वाले दिनों में इस विवाद का पटाक्षेप होता है या नहीं।

व्यक्तिगत विचार-आलेख-

श्री राकेश अचल जी  जी ,वरिष्ठ पत्रकार  एवं राजनैतिक विश्लेषक मध्यप्रदेश  । 

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