नई दिल्ली। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के खिलाफ अत्याचार रोकने के लिए बने SC/ST (Prevention of Atrocities) Act, 1989 की कुछ धाराओं और 2018 के संशोधनों को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सुनवाई से इनकार कर दिया। याचिका में कानून के कथित दुरुपयोग और इसकी कुछ कठोर व्यवस्थाओं की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए गए थे।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल थे। अदालत ने कहा कि 2018 में किए गए संशोधनों को सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ पहले ही 2020 के Prathvi Raj Chauhan v. Union of India मामले में बरकरार रख चुकी है। इसलिए उस फैसले को दोबारा चुनौती देने का आधार अदालत को स्वीकार्य नहीं लगा। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने दलील दी कि कानून की कुछ धाराओं का दुरुपयोग हो रहा है। याचिका में विशेष रूप से धारा 18 और 18A जैसी व्यवस्थाओं को चुनौती दी गई थी, जिनका संबंध अग्रिम जमानत और FIR दर्ज करने से जुड़ी प्रक्रिया से है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी कानून के संभावित दुरुपयोग के आरोप अपने आप उस कानून की संवैधानिक वैधता पर सवाल खड़ा करने का आधार नहीं बन जाते। अदालत के अनुसार, यदि किसी विशेष मामले में कानून का दुरुपयोग सामने आता है तो न्यायालय उपलब्ध न्यायिक शक्तियों के माध्यम से उस मामले में हस्तक्षेप कर सकते हैं। 2020 के फैसले में भी अदालत ने यह व्यवस्था दी थी कि यदि किसी शिकायत में प्रथम दृष्टया (prima facie) SC/ST Act के तहत अपराध का मामला नहीं बनता, तो कानून में मौजूद कुछ कठोर प्रावधानों का संरक्षण लागू नहीं होगा।
इस फैसले ने एक बार फिर कानून के उद्देश्य और उसके संभावित दुरुपयोग के बीच संतुलन की बहस को सामने ला दिया है। एक तरफ SC/ST समुदायों के खिलाफ अत्याचार के मामलों में कानूनी संरक्षण की आवश्यकता है, वहीं दूसरी तरफ किसी भी आपराधिक कानून के गलत इस्तेमाल की शिकायतों का समाधान न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से किया जाना है। #bhartbhvh
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